शरीर के अंगों के अनुसार उत्तराखंड के प्रमुख आभूषण

शरीर के अंगों के अनुसार उत्तराखंड के प्रमुख आभूषण

क) सिर व माथे के आभूषण

  • शिशफूल, मांगटीका, सुहाग बिंदी, बेनीफूल, बांधी।

  • बांधी: बिंदी से बड़े आकार का आभूषण (माथे पर धारण); मान्यतानुसार इसमें मुगलकालीन चित्रशैली का अंकन मिलता है।

  • भोटिया जनजाति विशेष (माथे/सिर): बीराबाली, छाकबाली, पतेली बाली।

ख) कान के आभूषण

  • मूर्खली (मुर्खी / मुदुर / मुनार / मर्खिया): जौनसार व अन्य क्षेत्रों में प्रचलित।

  • बाली (बल्ली), कुंडल, तुगल (बुजनी), गोख (गाखर), जलकछव, मछली।

  • कर्णफूल: इसे जोहार क्षेत्र में 'झुपझुपी' भी कहा जाता है।

  • झुमके (उतरो / उतराइयाँ): ऊपरी कान में पहने जाने वाले झुमके।

ग) नाक के आभूषण

  • नथ (नथिया / बेसर): नाक का बड़ा आभूषण।

  • बुलाक (बिसार): नाक के बीच के हिस्से में पहना जाने वाला।

  • फूली (लौंग), बीरा (बीड़), श्रृंगारपूरी।

    • अंतर ध्यान रखें: केवल 'बीरा' आए तो नाक का आभूषण; 'बीराबाली' आए तो सिर/माथे का।

घ) गले के आभूषण

  • गुलबंद (गलबंद): कुमाऊँ क्षेत्र में इसे 'रामनवमी' भी कहा जाता है।

  • हसूली (खुगा / खोंग / सतुवा / सूत): बच्चों एवं महिलाओं का चांदी का आभूषण।

  • हमेल: चौअन्नी (चार आने के सिक्कों) की माला।

  • हरवा: अठन्नी (आठ आने के सिक्कों) की माला।

  • कंठमाला, चंपाकली, मोहनमाला (पुरुषों द्वारा धारित), चंद्रहार (चनरहार), पोला, तिलहरी, पंचलड़ी, सतलड़ी, पंचमणि।

  • मटरमाला: इसे 'गंगी' भी कहा जाता है।

  • चम घड़ी: इसे 'जोमाला' भी कहा जाता है।

  • बगनखा: बच्चों के गले में पहनाया जाने वाला (बाघ के नाखून/दांत को चांदी में मढ़कर बनाया गया लॉकेट)।

  • जोहार/जौनसार क्षेत्र विशेष: त्वा/त्वेट, काडू, दोसरू (10 लड़ियों वाली माला), सूच।

ङ) हाथ व बाजू के आभूषण

  • धगल (धागुला / धावले / खंडवे): कड़े या धगुले (बच्चों तथा धार्मिक आयोजनों में देव-प्रतीक के रूप में भी धारित)।

  • पोंछी (पहुंची): कलाई में बांधने का आभूषण।

  • गुंटी (मुननी / मुद्री / मुद्रिका): अंगूठी। जौनसार में इसे 'छाप' कहा जाता है।

  • बाजूबंद (गोखले): बाजू पर पहना जाने वाला (कान के 'गोख' से अलग)।

  • ठक, सुवा, हिरोता, कांगण (कड़े/चूड़ियाँ - जौनसार)।

च) कमर के आभूषण

  • तगड़ी (तिगड़ी / करधनी / कंगी): कमर में बांधी जाने वाली।

  • अतरदान: जोहार क्षेत्र में प्रचलित; चांदी की चेन जिसमें इत्र (सुगंध) की डिबिया लगी होती है।

  • कमरजोड़ी।

छ) पैर के आभूषण

  • झिंझवरा (झेर / झांवर), पाजेब (जेवरी), इमरत (अमृततार), झड़तार, पजाम, बिछुवा (पुलिया/पोलिया)।

  • पोंटा: पैर का आभूषण (पोंछी = हाथ, पोला = गला, पोंटा = पैर)।

  • कंडवा (सुदम): पैर में पहने जाने वाले भारी कड़े (खंडवे = हाथ, कंडवा = पैर)।

  • गिना / बकड़े: चांदी के खोखले भारी कड़े।

  • लच्छा, शकुंतला, चैनपट्टी।

ज) अन्य विशेष आभूषण

  • शूर्ण सांगल (शिव सांगल): भोटिया महिलाओं द्वारा कंधे पर ऊनी धोती/परिधान को अटकाने के लिए प्रयुक्त सेफ्टी-पिन व चेन का गुच्छा (इसमें आभूषण साफ करने का ब्रश 'संगरिया', कान साफ करने का औजार आदि बंधा रहता है)।

  • जीजीपी: बालों में लगाया जाने वाला आभूषण।


उत्तराखंड के प्रमुख लोक वाद्य यंत्र

क) घन या धातु वाद्य (आपस में टकराकर/चोट से बजने वाले)

  • बिनाई (मोचंग): इसे होठों/दांतों के बीच दबाकर हाथ की उंगली से तार को छेड़कर बजाया जाता है (यह सुषिर वाद्य नहीं है)।

  • मंजीरा (मिजू), घाना/घानी, घुँघरू, कसेरी, झाँझ/झाँझर, काँसे की थाली, करताल, खंजरी, चिमटा, घंटी (घाण)।

  • भाणु: मंदिरों में बजाया जाने वाला थाली/तवे के आकार का धातु का वाद्य।

ख) चर्म या अवनद्ध वाद्य (चमड़े से मढ़े हुए)

  • ढोल, दमाऊ (दमामा), हुड़का (हुड़केश्वर), ढोलक, नगाड़ा (युद्ध वाद्य), ढपली, डमरू, मुर्य, धतीमा (धमतान)।

  • डोर (डंगर): कुमाऊँ में प्रचलित।

  • धोसी: हुड़का और डोर का मिश्रित रूप (जागर गायन में प्रयुक्त)।

  • विशेष प्रयोग: डोर और थाली का संयुक्त प्रयोग मुख्य रूप से जागर गायन में किया जाता है।

ग) सुषिर या फूँक वाद्य (हवा/फूँक से बजने वाले)

  • मुरली, जलिया मुरली (जुड़वां बाँसुरी)।

  • रणसिंघा (अंकोरा), भंकोरा, तुरही, नागफणी, शंख, नाद, उधोमुखी, मसकबीन, रमतुला, बाँसुरी (अलगोजा)।

घ) तात या तंतु वाद्य (तार वाले वाद्य)

  • सारंगी, एकतारा, दोतारा, वीणा, गोपीयंत्र।


 

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